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एक छात्र के प्रश्न : और पूरा तंत्र

  • dr neelam mahendra
  • Aug 16
  • 4 min read

    एक छात्र के प्रश्न : और पूरा तंत्र

भारत की सभ्यता में परीक्षा केवल अंकों का खेल नहीं रही। हमारे यहाँ परीक्षा का अर्थ रहा है,स्वयं को सिद्ध करना, अपनी योग्यता को समाज के समक्ष प्रमाणित करना और अपने श्रम को सम्मान दिलाना। यही कारण है कि भारतीय परिवारों में परीक्षा केवल विद्यार्थी नहीं देता, उसके साथ पूरा परिवार परीक्षा देता है। माँ अपनी नींद त्यागती है, पिता अपनी इच्छाएँ स्थगित करता है और छात्र अपनी किशोरावस्था का बड़ा हिस्सा पुस्तकों के बीच छोड़ आता है।

किन्तु आज प्रश्न यह है कि क्या हमारी परीक्षा प्रणाली भी उतनी ही ईमानदार है जितनी मेहनत हमारे बच्चे करते हैं?

यह प्रश्न इसलिए नहीं उठ रहा कि किसी परीक्षा में कुछ त्रुटियाँ हुई हैं। यह प्रश्न इसलिए उठ रहा है क्योंकि देश की दो सबसे बड़ी परीक्षा प्रणालियाँ,सी बी एस ई (CBSE) और नीट (NEET),लगातार विवादों में घिरी हैं।

सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर उठा विवाद  केवल डिजिटल मूल्यांकन की त्रुटि का नहीं है। मामला केवल किसी सॉफ्टवेयर, किसी टेंडर या किसी तकनीकी गड़बड़ी का भी नहीं है।

बात यह है कि जिस देश में प्रशासनिक ढाँचे पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हों, जहाँ विशेषज्ञ समितियों, सलाहकारों, तकनीकी वेंडरों और निरीक्षण एजेंसियों का पूरा तंत्र मौजूद हो, वहाँ एक 17 वर्षीय छात्र ऐसी कमियों की ओर संकेत कर देता है जिन्हें पूरा सिस्टम समय रहते पहचान नहीं पाता।

यही इस पूरे विवाद का सबसे असुविधाजनक सत्य है।

भारत में लगभग 4 करोड़ विद्यार्थी हर वर्ष किसी न किसी बोर्ड, प्रवेश या प्रतियोगी परीक्षा में बैठते हैं।

केवल सी बी सी ई CBSE) की बोर्ड परीक्षाओं में 42 लाख से अधिक विद्यार्थी शामिल होते हैं।

नीट (NEET)में 22 लाख से अधिक अभ्यर्थी बैठते हैं।

जे ई मैन (JEE Main) में 15 लाख से अधिक विद्यार्थी भाग लेते हैं।

अर्थात भारत का परीक्षा तंत्र कई देशों की कुल आबादी से बड़ा है।

ऐसे में परीक्षा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होती, वह राज्य और नागरिक के बीच विश्वास का अनुबंध होती है।

लेकिन जब एक छात्र सार्वजनिक रूप से यह प्रश्न पूछता है कि मूल्यांकन प्रणाली, टेंडर प्रक्रिया और तकनीकी संरचना में इतनी स्पष्ट विसंगतियाँ मौजूद थीं तो उन्हें पहले क्यों नहीं देखा गया, तब उसका प्रश्न केवल CBSE से नहीं, पूरे शासन-तंत्र से होता है।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह नहीं कि तकनीकी गड़बड़ियाँ हुईं।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जिन कमियों को पहचानने के लिए पूरा प्रशासनिक ढाँचा मौजूद था, उन्हें उजागर करने का काम एक 17 वर्षीय छात्र को करना पड़ा।

यही इस पूरे प्रकरण का सबसे असहज और सबसे महत्वपूर्ण सत्य है।

आखिर अधिकारी देख क्यों नहीं पाए?

भारत में प्रशासनिक सेवा को देश का सबसे सक्षम तंत्र माना जाता है। हजारों अभ्यर्थियों में से चुनकर आने वाले अधिकारी नीति निर्माण से लेकर अरबों रुपये की परियोजनाओं तक का संचालन करते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि जिस व्यवस्था के पास विशेषज्ञ, सलाहकार, तकनीकी समितियाँ और निगरानी तंत्र मौजूद हों, वहाँ एक छात्र को ऐसी खामियाँ क्यों दिखाई देती हैं जो अधिकारियों को नहीं दिखतीं?

उत्तर असुविधाजनक है।

समस्या क्षमता की नहीं, संवेदनशीलता की है।

हमारी नौकरशाही का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे उस वास्तविक दुनिया से दूर होता गया है जिसके लिए वह बनाई गई थी। फाइलों में सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है। प्रस्तुतियों में सब कुछ सफल दिखाई देता है। रिपोर्टों में सब कुछ नियंत्रित दिखाई देता है। लेकिन जमीन पर खड़ा विद्यार्थी अक्सर एक अलग वास्तविकता देख रहा होता है।

यही दूरी अंततः संकट को जन्म देती है।

और यह संकट है,'सब ठीक है' की मानसिकता का।

भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या यही आत्ममुग्धता है कि, फाइल में सब ठीक है! प्रेजेंटेशन में सब ठीक है! डैशबोर्ड में सब ठीक है!

लेकिन जमीन पर क्या हो रहा है, यह जानने की कोशिश ही नहीं की जाती।

यही कारण है कि अक्सर चेतावनी के संकेत पहले छात्रों, शिक्षकों, पत्रकारों या आम नागरिकों को दिखाई देते हैं और बाद में अधिकारियों को।

 

एक छात्र ने इस सिस्टम को चुनौती दी है।

यह घटना एक प्रतिभाशाली छात्र की  छात्र की जीत से अधिक, एक व्यवस्था की हार की कहानी है।

क्योंकि परीक्षा में हुई गड़बड़ी सुधारी जा सकती है।

सॉफ्टवेयर बदला जा सकता है।

अधिकारियों का तबादला किया जा सकता है।

नई समिति बनाई जा सकती है।

लेकिन यदि छात्रों का विश्वास टूट जाए, तो उसकी भरपाई किसी प्रशासनिक आदेश से नहीं की जा सकती।

युवाओं का विश्वास किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होता है।

जिस दिन उन्हें यह लगने लगे कि उनकी मेहनत से अधिक महत्व व्यवस्थागत कमजोरियों का है, उसी दिन संस्थाओं की नैतिक शक्ति कमजोर होने लगती है।

सुधार किसी नए पोर्टल से शुरू नहीं होगा।

सुधार किसी नई समिति से भी शुरू नहीं होगा।

सुधार तब शुरू होगा जब व्यवस्था यह स्वीकार करेगी कि पारदर्शिता कोई कृपा नहीं, लोकतांत्रिक दायित्व है।

और जब विफलताओं की जिम्मेदारी केवल सिस्टम की नहीं होगी, इसके व्यक्ति भी जवाबदेह होंगे।

इस घटना से आज हम एक ऐसे दोराहें पर खड़े हैं जहाँ छात्रों की परीक्षा के साथ,परीक्षा स्वयं व्यवस्था की भी चल रही है।

दुर्भाग्य से इस बार प्रश्नपत्र व्यवस्था के सामने था,और उत्तर एक छात्र ने दिया।

 

डॉ नीलम महेंद्र

(लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्य हैं।)

 
 
 

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