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इंडिगो: अव्यवस्था का जिम्मेदार कौन?

  • dr neelam mahendra
  • 2 hours ago
  • 5 min read


 

भारत की आकाश रेखा आज जितनी व्यस्त दिखाई देती है, उतनी शायद पहले कभी नहीं रही। रोज़ाना देश के आसमान में लगभग 4,500 उड़ानें चलती हैं। खास बात यह है कि इनमें से आधे से अधिक की कमान एक ही कंपनी “इंडिगो” के हाथ में है। डीजीसीए के 2023–24 के आंकड़े बताते हैं कि इंडिगो का मार्केट शेयर 65 प्रतिशत के आसपास  है। यानी हर 100 यात्रियों में से लगभग 65 यात्री इंडिगो पर निर्भर हैं। किसी भी उद्योग में ऐसी स्थिति शायद ही देखने को मिले, जहां एक कंपनी पूरे बाजार की रीढ़ बन जाए। लेकिन जब रीढ़ ही कांपने लगे, तो पूरा शरीर हिल जाता है। हाल में यही हुआ जब डीजीसीए ने फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन यानी FDTL के नए नियम लागू किए। इन के अनुसार अब पायलटों को सात दिन कम के बाद 48 घंटों का आराम, लगातार दो रात से ज्यादा ड्यूटी नहीं, एवं दो नाइट लैंडिंग से अधिक नहीं जैसे नियम थे। इन नियमों का लक्ष्य साफ़ था—पायलटों की थकान कम करना और उड़ानों की सुरक्षा को नया मानक देना। दुनिया में थकान-जनित गलतियाँ एविएशन हादसों में लगभग 20–30 प्रतिशत योगदान देती हैं। भारत में, जहां हवाई यात्रा पिछले दस सालों में लगभग 70 प्रतिशत बढ़ी है, यह कदम देर से उठा  एक महत्वपूर्ण कदम था।

लेकिन इस के कारण जिस प्रकार से इंडिगो की एक दिन में 1000 उड़ानें देश भर में रद्द हुई हैं और यात्री परेशान हुए हैं उससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि नियम बनाना ही काफी नहीं  होता अपितु जबतक उनका क्रियान्वन नहीं होता, अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते।

इंडिगो, जो भारत के घरेलू उड़ान बाज़ार पर लगभग एकाधिकार जैसा नियंत्रण रखती है, इन नियमों से सबसे अधिक प्रभावित हुई या कहें कि इंडिगो के यात्री परेशान हुए। नए प्रावधानों के अनुसार एयरलाइन को लगभग 350 से 400 अतिरिक्त पायलटों की जरूरत थी, जबकि इसके मुकाबले उसकी तैयारी सीमित थी। जब इस कमी की वास्तविक गूंज सामने आई, तब तक देर हो चुकी थी। इंडिगो को चार सौ से अधिक उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। लेकिन इस अव्यवस्था में सबसे बड़ी कीमत किसने चुकाई?

उन हजारों यात्रियों ने जो रातों को हवाईअड्डों की ठंडी कुर्सियों पर गुज़ारने पर मजबूर हुए। एक माँ ने जिसने बच्चे के साथ पूरी रात एयरपोर्ट पर बिना जानकारी के इंतज़ार किया। उस बीमार पिता ने जिसका बेटा फ्लाइट रद्द होने के कारण समय पर उसके पास नहीं पहुंच पाया। उस युवा ने जो अपने भविष्य को संवारने किसी कंपनी में इंटरव्यू के लिए जा रहा था। उस जोड़े ने जिसे अपनी ही शादी के रिसेप्शन में फ्लाइट रद्द होने से ऑनलाइन शामिल होना पड़ा।

विडम्बना यह है कि भारत का यह एविएशन संकट मशीनों की वजह से या तकनीकी खराबी से या मौसम की वजह से नहीं हुआ। अपितु यह संकट उस मॉडल की वजह से हुआ जिसमें सरकार भी आराम से सोती रही, नियामक भी भरोसे में रहा, और कंपनी भी अपनी क्षमता के भ्रम में। और तीनों की इस सामूहिक नींद ने पूरे देश की नींद उड़ा दी।

इसे क्या कहा जाए कि इंडिगो ने डीजीसीए के समक्ष आधिकारिक रूप से यह स्वीकार किया है कि यह संकट “मिसजजमेंट और प्लानिंग की विफलता” का परिणाम था। यानी कंपनी ने अपनी ही सामर्थ्य का गलत आकलन किया, FDTL के दूसरे चरण को लागू करने में चूक की, और इसके परिणाम अब राष्ट्र स्तर पर दिख रहे हैं। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि इंडिगो ने कहा है कि वह फरवरी 2026 तक पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाएगी।

इंडिगो की इस लापरवाही ने केवल यात्रियों को नहीं, बल्कि पूरे एयरलाइंस बाज़ार को झकझोर दिया। जिस दिन इंडिगो डगमगाई, उसी दिन लगभग सभी हवाई रूट्स पर किराए अचानक 25 से 40 प्रतिशत बढ़ गए। दिल्ली–मुंबई जैसे व्यस्त रूट्स पर किराया 25,000 से ऊपर पहुंच गया। आमजन पर पड़े इस संकट की पराकाष्ठा यह रही कि चार दिन में देश भर में दो हजार से अधिक उड़ानें रद्द करके अराजकता उत्पन्न करने वाली इंडिगो  ही यात्रियों से तीन से छ गुना तक किराया वसूल रही है। इतना ही नहीं राजधानी में तो होटलों की कीमतें भी उछलीं। रूस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के कारण पहले ही दिल्ली के होटल लगभग 95 प्रतिशत भरे हुए थे। जब हजारों यात्री फ्लाइट रद्द होने के कारण अचानक रुकने को मजबूर हुए, तो बाज़ार ने वही किया जो वह हमेशा करता है, दरों में इजाफा। यात्रियों की जेबें और गहरी चोट लेकर लौटीं।

तो अब बुनियादी प्रश्न यह उठता है कि क्या इंडिगो को इस अव्यवस्था का पूर्वानुमान नहीं था? क्योंकि डीजीसीए द्वारा उड़ान एवं क्रू संबंधी नए नियम जनवरी 2024 में निर्देशित कर दिए गए थे और तब उन्हें जून 2024 से लागू करने का प्रस्ताव था। किन्तु विमानन कंपनियों द्वारा इन नए नियमों के साथ सामंजस्य बैठने में आने वाली व्यवहारिक परेशानियों को देखते हुए इन नए नियमों को लागू करने का समय सरकार ने एक साल बढ़ाकर जुलाई 2025 तक कर दिया था और अंतिम समय 1 नवंबर 2025 तक कर दिया था। इतना समय मिलने के बाद भी इंडिगो की हवाई सेवाएं इस तरह से क्रैश होना अपने आप में इंडिगो और सरकार दोनों पर ही कई प्रश्न खड़े करता है।

इसे क्या कहा जाए कि आमजन की असुविधा और इस स्तर पर हो रही अव्यवस्था को देखते हुए सरकार को अपने ही निर्णय पर रोक लगानी पड़ी।

इंडिगो द्वारा अपनी हवाई सेवाएं निरस्त करने और फिर सरकार का अपने नियमों पर रोक लगाने की इस घटना से एक और असहज परन्तु एक महत्वपूर्ण  प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि यदि एक कंपनी देश और सरकार को इस हद तक हिला सकती है कि देश की आधी उड़ानें प्रभावित हो जाएं, तो क्या सरकार को अपने निर्णयों के प्रभाव और उनके क्रियान्वन की सुनिश्चितता पर पुनर्विचार नहीं करना चाहिए?

यह सवाल सरकार की नीयत पर नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की प्रक्रिया पर उठता है।

क्योंकि देश आज उस बिंदु पर खड़ा है जहाँ कोई भी पक्ष पूर्णतः निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता। न सरकार, जो एकाधिकार समान स्थिति बनने से रोकने में विफल रही, न इंडिगो, जिसने अपने संसाधनों और वास्तविक क्षमता का अनुमान लगाने में भारी चूक की और न नियामक, जिसने यह मान लिया कि कागज़ों के नियम ज़मीन पर भी उतनी ही आसानी से लागू हो जाएंगे।

आज जब सरकार घरेलू उड़ानों के विस्तार, छोटे शहरों की कनेक्टिविटी, हवाई चप्पल पहनने वालों को हवाई यात्रा सुगम कराने जैसे मॉडल पर आगे बढ़ रही है तो हवाई सेवाओं का वर्तमान संकट इंडिगो का नहीं देश का संकट बन जाता है। विमान भले ही इंडिगो के थमे लेकिन उड़ान देश की थमी।

भविष्य में देश की उड़ान कभी न थमे इसके लिए जरूरी है कि न केवल एयरलाइंस, बल्कि सरकार भी अपने निर्णयों के प्रभाव और उनके क्रियान्वन को गंभीरता से समझे। आवश्यक है कि वर्तमान परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार भविष्य के लिए कुछ ऐसे ठोस कदम उठाए ताकि भविष्य में इस प्रकार की अनियमितता की स्थिति से विमान कंपनियां मात्र यह कहकर न बच पाएं कि उन्हें स्थिति का पूर्वानुमान नहीं था।

 

डॉ नीलम महेंद्र

 
 
 

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