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खाने में मिलावट भ्रष्टाचार या धोखा?

  • dr neelam mahendra
  • 19 hours ago
  • 3 min read

एनालॉग पनीर के साथ ही खाद्य पदार्थों में मिलावट अचानक चर्चा में है। बात सिर्फ पनीर में मिलावट की नहीं है बल्कि बात यह है कि पनीर के नाम पर जो परोसा जा रहा है वह दूध से बना पनीर ही नहीं है वो एनालॉग पनीर है!

अब प्रश्न यह उठता है कि हम में से कितने लोग इसका मतलब समझते हैं?

हममें से अधिकांश लोगों के लिए पनीर दूध से बना प्रोटीन का पोषण से भरपूर एक बहेतरीन व्यंजन है।

लेकिन एनालॉग पनीर असली दूध के बजाए वनस्पति तेल (पॉम ऑयल), स्टार्च, मिल्क पाउडर और केमिकल से बनाया जाने वाला एक कृत्रिम उत्पाद है।

सेहत पर इसके बुरे प्रभाव और इसे असली पनीर बताकर बेचने के मामलों के चलते कई राज्यों की सरकारों जैसे मध्यप्रदेश,महाराष्ट्र, गुजरात और छत्तीसगढ़ ने इसके निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। दरअसल इसमें कैल्सियम और प्रोटीन न के बराबर होते हैं जबकि हानिकारक वसा होने के कारण यह लीवर, किडनी और दिल की बीमारी का खतरा बढ़ाता है। लेकिन कम कीमत और लंबी शेल्फ लाइफ़ के कारण होटल रेस्टोरेंट और वेंडर इसका प्रयोग पनीर के नाम पर करते हैं।

जो लोग वसा और कार्बोहाइड्रेट से परहेज करते हुए प्रोटीन के लिए पनीर अपने भोजन में शामिल करते हैं उनके लिए एनालॉग पनीर फैट और स्टार्च से युक्त एक धोखा है। बल्कि सेहत के प्रति संवेदनशील ऐसे लोगों को जब केमिकल से युक्त एनालॉग पनीर परोसा जाता है तो इसे क्या कहा जाए? धोखा? अज्ञानता? भ्रष्टाचार? या जागरूकता की कमी?

दरअसल व्यवसायीकरण के इस दौर में शब्दों का प्रयोग बड़ी चालाकी से किया जाता है। 

और यहीं से मिलावट का असली खेल शुरू होता है जिसे blend कहते हैं। इसे ऐसे समझिए कि मिलावट हमेशा कोई जहरीला पदार्थ मिलाने का नाम नहीं है। कई बार कहानी इससे कहीं अधिक गहरी होती है। जैसे किसी महंगे या विशेष खाद्य पदार्थ में दूसरा सस्ता खाद्य मिलाना।

भारतीय खाद्य मानकों के अनुसार खाद्य तेलों में blending अपने आप में अवैध नहीं है। FSSAI के अनुसार दो खाद्य वनस्पति तेलों का निर्धारित अनुपात में मिश्रण मान्य हो सकता है, लेकिन उपभोक्ता को यह मालूम चाहिए कि उसमें कौन-कौन से तेल और कितनी मात्रा में हैं।

इसी प्रकार कॉफी में चिकोरी का मिश्रण भी कोई छिपी हुई मिलावट नहीं है। भारत में कॉफी चिकोरी मिश्रण एक मान्य खाद्य श्रेणी है लेकिन उसके लिए कॉफी तथा चिकोरी का प्रतिशत लेबल पर बताना आवश्यक है।

यानी blend अपराध नहीं है लेकिन blend को छिपाना अवश्य अपराध है।

सरसों का तेल, शहद, घी, मक्खन इन सभी में इनकी लागत को कम करने के लिए blend किया जाता है विभिन्न पदार्थों का। लेकिन इनकी पैकिंग में लिखा होता है blend। जागरूक उपभोक्ता पैकिंग देख कर उत्पाद खरीद सकता है।

लेकिन क्या वाकई में ऐसा ही है?

आइसक्रीम और फ्रोजेन डेसर्ट को ही लीजिए। असली आइसक्रीम पूरी तरह दूध और डेयरी फैट से बनती है जबकि फ्रोजेन डेसर्ट  वेजिटेबल ऑयल जैसे पॉम ऑयल और वेजिटेबल फैट से तैयार की जाती है। देखने में और स्वाद में यह दोनों एक जैसे लगते हैं लेकिन सेहत पर इनके प्रभाव और इनको बनाने में उपयोग की जाने वाली सामग्री में बुनियादी अंतर होता है। FSSAI के नियमों के अनुसार कोई भी कंपनी वेजिटेबल ऑयल से बनी चीज को आइसक्रीम नहीं लिख सकती उसे फ्रोजेन डेसर्ट लिखना होता है। क्वालिटी वॉल्स, वाडीलाल जैसी कई कंपनियां फ्रोजेन डेसर्ट बनाती हैं। खास बात यह है कि FSSAI के नियमों के अनुसार ये कंपनियां पैकिंग पर लिखती हैं फ्रोजेन डेसर्ट लेकिन विज्ञापन आइसक्रीम के नाम पर करती हैं। अधिकांश लोग भ्रमित होकर आइसक्रीम के नाम पर फ्रोजेन डेसर्ट खा रहे होते हैं, दुग्ध उत्पाद के नाम पर पॉम ऑयल और वेजिटेबल फैट का सेवन कर रहे होते हैं लेकिन उन्हें इसकी जानकारी ही नहीं होती। 

अब यहाँ दो परिस्थितियां हैं, एक  यह कि पैकेजिंग पर जानकारी दी गई लेकिन विज्ञापन भ्रमित करने वाला है और दूसरी यह कि जानकारी ही नहीं दी जाती, जैसे होटलों में जो पनीर परोसा जा रहा है।

दरअसल आज बड़ी विकट परिस्थिति निर्मित हो गई है। खाद्य पदार्थों में मिलावट केवल रेस्टोरेंट या कंपनियों तक ही सीमित नहीं है फलों को कार्बाइड से पकाना, तरबूज में इंजेक्शन लगाना, सेब पर मोम की कोटिंग लगाना या कृत्रिम रंग लगाना, गोभी, भिंडी जैसी सब्जियों की फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए अत्यधिक मात्रा में हानिकारक कीटनाशकों का प्रयोग करना। 

जिस अन्न को हम देवता मानते हैं, जो अन्न हमें जीवन देता है, जो हमें स्वास्थ्य देता है,उसी को हम इस कदर दूषित करते जा रहे हैं कि आज वो हमें बीमार कर रहा है फूड पॉइजनिंग से लेकर कैंसर जैसी बीमारियों का जनक बनता जा रहा है। 

समय है रुक कर सोचने का कि व्यवसायीकरण के नाम पर हम अपने स्वास्थ्य के साथ समझौता तो नहीं कर रहे? क्या देश के स्वास्थ्य की कीमत पर  आर्थिक प्रगति देश को आगे लेकर जा सकती है?

डॉ नीलम महेंद्र 

लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्य हैं।

 
 
 

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