डिजिटल लोरी के साये में सुबकता बचपन
Updated: Aug 16
# डिजिटल लोरी के साये में सुबकता बचपन
बदलती हुई दुनिया में बच्चों का बचपन
कभी बच्चे की पहली दुनिया मां की गोद हुआ करती थी। उसकी पहली पाठशाला घर का आंगन था। उसका पहला मनोरंजन मिट्टी में खेलना था। उसकी नन्हीं दुनिया की पहली कहानी दादी और नानी की आवाज में होती थी। उसका पहला खिलौना कोई लकड़ी का घोड़ा या कपड़े की गुड़िया होता था। लेकिन आज तस्वीर बदल गई है। अब बच्चे की पहली दुनिया एक चमकती हुई स्क्रीन है। पहली लोरी यूट्यूब का वीडियो है। पहला दोस्त कोई कार्टून चरित्र है। और पहला खिलौना स्मार्टफोन बन गया है।
यह केवल बदलते समय के साथ तकनीक के विस्तार की कहानी नहीं है। यह बचपन के धीरे-धीरे सिकुड़ते जाने की कहानी है।
बच्चों के मानसिक विकास पर प्रभाव
हाल ही में पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ की प्रोफेसर डॉ. और उनकी टीम द्वारा किए गए अध्ययन ने इस संकट को आंकड़ों की भाषा में सामने रखा है। शोध के अनुसार, देश के लगभग 68 प्रतिशत बच्चे भोजन करते समय मोबाइल या किसी स्क्रीन को देखते हैं। यह केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं है। यह भारतीय परिवार व्यवस्था में आ रहे एक गहरे परिवर्तन का संकेत है। भोजन की थाली, जो कभी संवाद, संस्कार और आत्मीयता का केंद्र हुआ करती थी, अब डिजिटल मनोरंजन का मंच बनती जा रही है।
यह विषय विचारणीय है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2019 की गाइडलाइन स्पष्ट रूप से कहती है कि दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखा जाना चाहिए। जबकि दो से पांच वर्ष तक के बच्चों के लिए स्क्रीन समय एक घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए। WHO का मानना है कि छोटे बच्चों के लिए सक्रिय शारीरिक गतिविधियों वाले खेल, पर्याप्त नींद और मानवीय संवाद किसी भी डिजिटल माध्यम से कहीं अधिक सार्थक एवं उपयोगी हैं।
चिंताजनक वर्तमान परिदृश्य
हालांकि, वर्तमान परिदृश्य बेहद चिंताजनक है। मोबाइल फोन अब घरों में केवल संचार का माध्यम नहीं रह गया है। यह बच्चों को शांत रखने, उन्हें खाना खिलाने और व्यस्त रखने का सबसे आसान माध्यम बन चुका है। यह बड़ी ही विकट स्थिति है।
दरअसल, यह वैज्ञानिक तथ्य है कि मानव मस्तिष्क के विकास का सबसे महत्वपूर्ण समय जन्म से पांच वर्ष तक का होता है। इसी अवधि में भाषा, भावनाएं, सामाजिक कौशल, कल्पनाशक्ति और सीखने की क्षमता की नींव रखी जाती है। जब किसी बालक की उम्र की इस अवधि का अधिकांश समय स्क्रीन के सामने बीतता है, तो उसका प्रभाव केवल उसकी आंखों पर नहीं, बल्कि उसके पूरे व्यक्तित्व और मानसिक विकास पर पड़ता है।
पारिवारिक संवाद का अभाव
एक समय था जब भारतीय परिवारों में भोजन के दौरान बच्चों को कहानियां सुनाई जाती थीं। दिनभर की बातें पूछी जाती थीं। कुछ कही जाती थीं तो कुछ सुनी जाती थीं। इसी बहाने जीवन के छोटे-छोटे संस्कार के बीज भी बच्चों में जाने अनजाने बो दिए जाते थे। जबकि आज बच्चे का मुंह खुलवाने के लिए मोबाइल स्क्रीन की आवश्यकता पड़ती है। बच्चा खाते समय कार्टून देख रहा होता है। ऐसे में उसे यह एहसास नहीं होता कि उसने कितना खाया, क्या खाया और उसका स्वाद कैसा था।
चिकित्सकों के अनुसार, ऐसी आदतें आगे चलकर अस्वस्थ खान-पान, मोटापे और व्यवहार संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती हैं।
सकारात्मक बदलाव की संभावना
हालांकि, पीजीआईएमईआर के इसी अध्ययन में एक सकारात्मक बात भी सामने आई है। जब बच्चों का स्क्रीन टाइम 73 प्रतिशत कम किया गया, तो उनकी खेल गतिविधियों में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह आंकड़ा अत्यंत उत्साहित करने वाला है। यह बताता है कि समस्या बच्चों में नहीं है। बच्चा आज भी खुली हवा में दौड़ना चाहता है। वह आज भी मिट्टी में खेलना चाहता है। वह आज भी तितलियों के पीछे भागना चाहता है।
दरअसल, हमने ही उसके स्वाभाविक बचपन को डिजिटल उपकरणों के पीछे धकेल दिया है। जैसे ही स्क्रीन का प्रभाव कम हुआ, बचपन फिर से सामने आ गया।
भाषा विकास में विलंब
कनाडा में लगभग 900 बच्चों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि छोटे बच्चों में प्रत्येक अतिरिक्त 30 मिनट स्क्रीन उपयोग के साथ उनमें भाषा के विकास में विलंब का जोखिम लगभग 49 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। विभिन्न शोधों में यह बात सामने आई है कि बच्चों के बढ़ते स्क्रीन टाइम के साथ उनमें ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी आ जाती है।
आखिर जो बच्चा स्क्रीन पर हर दो या तीन सेकंड में बदलती रील या तस्वीर का आदि हो चुका है, वह अधिक समय तक किसी एक विषय पर अपना ध्यान कैसे केंद्रित रख पाएगा? इसके अतिरिक्त, भाषा विकास में विलंब, नींद की गुणवत्ता में गिरावट, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार, सामाजिक कौशलों में कमी और सबसे महत्वपूर्ण, शारीरिक गतिविधियों में गिरावट जैसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं।
माता-पिता की भूमिका
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स भी लंबे समय से चेतावनी देती रही है कि छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन समय सीमित होना चाहिए। प्राथमिकता हमेशा खेल, पढ़ने, संवाद और पारिवारिक सहभागिता को मिलनी चाहिए।
असली समस्या बच्चे नहीं, हम हैं! अक्सर कहा जाता है कि बच्चे मोबाइल के आदी हो गए हैं। लेकिन सच यह है कि बच्चा मोबाइल का आदी होकर पैदा नहीं होता। उसे हम बनाते हैं। जब माता-पिता स्वयं भोजन के दौरान फोन देखते हों, परिवार के सदस्य एक ही कमरे में बैठकर अलग-अलग स्क्रीन में खोए हों, तब बच्चे से डिजिटल अनुशासन की अपेक्षा करना आत्मवंचना है।
बच्चे उपदेश नहीं सुनते, वे व्यवहार की नकल करते हैं। इसी लिए हाल के अनेक अध्ययनों में विशेषज्ञों ने माता-पिता के स्क्रीन व्यवहार को बच्चों के स्क्रीन व्यवहार का सबसे बड़ा निर्धारक माना है।
एक नया सामाजिक संकट
यह केवल एक अध्ययन या आंकड़ा नहीं है। यह एक नया सामाजिक संकट है! क्योंकि आज पार्कों में बच्चों की संख्या घट रही है। किताबों की जगह वीडियो ले रहे हैं। संवाद की जगह नोटिफिकेशन ले रहे हैं। और अनुभव की जगह स्क्रीन-आधारित उत्तेजना ले रही है।
यह परिवर्तन केवल जीवनशैली का नहीं, बल्कि सभ्यता का प्रश्न है। इसका समाधान तकनीक का विरोध नहीं है, बल्कि उसके साथ संतुलन है। पहले विचार, फिर व्यवहार और अंततः अपनी जीवनशैली में थोड़ा सा बदलाव हमारे बच्चों का बचपन बचा सकता है।
समाधान के उपाय
भोजन के समय पूर्णतः स्क्रीन-मुक्त वातावरण बनाना चाहिए। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल और टैबलेट बंद करना चाहिए। प्रतिदिन कम से कम एक घंटा खुली और ताजा हवा में कोई भी शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। बच्चों के साथ पुस्तक पढ़ने और बातचीत का समय निकालना चाहिए। माता-पिता द्वारा स्वयं डिजिटल अनुशासन का पालन करना चाहिए। ये कदम छोटे हैं लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी होते हैं।
इन छोटे छोटे कदमों से बच्चे आभासी दुनिया से दूर होंगे और वास्तविक दुनिया से जुड़ेंगे। दरअसल, बुनियादी प्रश्न यह नहीं है कि बच्चों के हाथ में मोबाइल क्यों है। बुनियादी प्रश्न यह है कि उनके हाथों से किताबें, रंग, गेंद, मिट्टी और सपने क्यों छूट रहे हैं।
तकनीक का सही उपयोग
तकनीक मानवता की सेवा के लिए बनी थी। यदि वही तकनीक बचपन को निगलने लगे, तो हमें ठहरकर सोचना होगा। आज ए आई के दौर में आने वाली पीढ़ी के पास शायद भविष्य में दुनिया की सारी जानकारी होगी। लेकिन यदि उसके पास कल्पना, संवेदना, धैर्य और मानवीय संबंध नहीं होंगे, तो वह तकनीकी रूप से सम्पन्न तो होगी।
लेकिन उस सम्पन्नता में भी उसे अधूरेपन का एहसास होगा। उस अधूरे बचपन का एहसास जो मोबाइल स्क्रीन के पीछे कहीं छूट गया था।



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